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भगवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 8–12

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग · श्लोक 8, 9, 10, 11, 12

13.8–12

श्लोक 8, 9, 10, 11, 12

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |

आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ||१३-८||

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च |

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ||१३-९||

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३-१०||

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||१३-११||

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ||१३-१२||

अनुवाद

।।13.8।। अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।। ।।13.9।। इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।। ।।13.10।। आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।। ।।13.11।। अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।। ।।13.12।। अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

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